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सोशल मीडिया: एक लेखक की आँखों से

  • Writer: Anish Rao
    Anish Rao
  • Feb 8
  • 3 min read

जब एक लेखक सोशल मीडिया खोलता है, तो वह सिर्फ़ एक स्क्रीन नहीं देखता, वह अपने समय की धड़कन सुनने की कोशिश करता है। वहाँ शब्दों की कोई कमी नहीं है, कमी है तो ठहराव की। हर कोई कुछ न कुछ कह रहा है, लेकिन बहुत कम लोग हैं जो सच में कुछ कहना चाहते हैं। एक लेखक के लिए यह दृश्य एक साथ आकर्षक भी है और थकाने वाला भी।


सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे बड़ा मंच माना जाता है। यहाँ बोलने से पहले किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं, किसी संपादक की लाल स्याही नहीं, किसी प्रकाशक की शर्तें नहीं। यह आज़ादी एक लेखक को लुभाती है, क्योंकि उसके शब्द सीधे लोगों तक पहुँच सकते हैं। लेकिन इसी आज़ादी के भीतर एक दबाव भी छिपा है—जल्दी बोलने का, कम बोलने का, और ऐसा बोलने का जो तुरंत ध्यान खींच ले।

लेखक के लिए लिखना कभी भी सिर्फ़ प्रतिक्रिया नहीं रहा। वह लिखता है क्योंकि उसके भीतर कोई विचार बार-बार दस्तक देता है, क्योंकि कुछ बातें तब तक बेचैन करती हैं जब तक वे शब्द न बन जाएँ। सोशल मीडिया इस बेचैनी को जल्दबाज़ी में बदल देता है। यहाँ विचारों को पकने का समय नहीं मिलता। हर घटना पर तुरंत राय देनी होती है, हर मुद्दे पर तत्काल भाव दिखाना होता है। सोचने का समय आज एक विलासिता बन चुका है।


इस दुनिया में शब्द बहुत सस्ते हो गए हैं। हर पोस्ट, हर कैप्शन, हर कमेंट शब्दों से भरा है, लेकिन उनमें से ज़्यादातर बोले गए हैं, जिए गए नहीं। बोलने और कहने के बीच का फर्क धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। एक लेखक जब यह देखता है, तो उसे अपने शब्दों की ज़िम्मेदारी और भी भारी लगने लगती है। वह जानता है कि हर बात कहना ज़रूरी नहीं, और हर कही गई बात सच नहीं होती।


सोशल मीडिया पर लिखना अक्सर दिखने की प्रक्रिया बन जाता है। लाइक्स, शेयर, व्यूज़—ये सब धीरे-धीरे लेखन की कसौटी बन जाते हैं। लेखक के भीतर एक द्वंद्व पैदा होता है। क्या वह वही लिखे जो उसके भीतर से आ रहा है, या वही जो मंच चाहता है? यहीं लेखन का स्वभाव बदलने लगता है। शब्द ईमानदार कम और रणनीतिक ज़्यादा हो जाते हैं। और जब ऐसा होता है, तो लेखन असरदार दिख सकता है, लेकिन सच्चा नहीं रहता।

आज लेखक सिर्फ़ समाज से नहीं, एल्गोरिदम से भी बात कर रहा है। यह एक अदृश्य ताक़त है जो तय करती है कि क्या दिखेगा और क्या खो जाएगा। गहराई यहाँ अक्सर हार जाती है, क्योंकि मंच को ठहराव नहीं, गति चाहिए। लंबा लिखना बोझ माना जाता है, चुप्पी को कमजोरी समझा जाता है। ऐसे में लेखक या तो खुद को छोटा करता है, या धीरे-धीरे खामोश हो जाता है।


यह एक अजीब विरोधाभास है कि सोशल मीडिया ने हर किसी को लेखक बना दिया है, लेकिन लेखक को अकेला भी कर दिया है। जब हर अनुभव साझा होने लगता है, तो अनुभव की गंभीरता कम हो जाती है। जब हर दुख पोस्ट बन जाए, तो संवेदना थक जाती है। लेखक भीड़ के बीच खड़ा होता है, लेकिन उसे लगता है कि उसकी भाषा कहीं खो रही है, क्योंकि उसकी भाषा धैर्य माँगती है और धैर्य आज दुर्लभ है।

फिर भी, एक लेखक इस मंच से पूरी तरह मुँह नहीं मोड़ सकता। क्योंकि यहीं समय बोलता है। यहीं लोगों के डर, ग़ुस्से, भ्रम और उम्मीदें बिना फ़िल्टर के सामने आती हैं। लेखक अगर यहाँ नहीं रहेगा, तो वह अपने समय से कट जाएगा। मुद्दा सोशल मीडिया को छोड़ने का नहीं है, मुद्दा यह तय करने का है कि वहाँ रहते हुए अपनी सच्चाई कैसे बचाई जाए।


एक लेखक का प्रतिरोध बहुत शोर नहीं करता। वह भीड़ में भी अपने शब्दों की गति तय करता है। वह जानता है कि हर पोस्ट वायरल नहीं होगी, और उसे इसकी ज़रूरत भी नहीं। अगर उसके लिखे हुए कुछ शब्द किसी एक इंसान के भीतर ठहर जाएँ, तो वही काफ़ी है। क्योंकि सोशल मीडिया क्षणिक है, लेकिन ईमानदार लेखन अब भी टिक सकता है।

मैं सोशल मीडिया को न पूरी तरह नकारता हूँ, न पूरी तरह अपनाता हूँ। मैं बस उसमें रहते हुए खुद को खोना नहीं चाहता। मेरे लिए शब्द अभी भी सोच से निकलते हैं, गणना से नहीं। और शायद यही आज एक लेखक का सबसे बड़ा पक्ष है।


मैं शोर के बाज़ार में भी सच लिखना चाहता हूँ, भीड़ में रहकर भी, अपने शब्दों के साथ ईमानदार हूँ।

 
 
 

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